कार्तिक पूर्णिमा : पुण्य, दान और देव दीपावली

DISCLAIMER (अस्वीकरण):-

यह लेख केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। कृपया पूजा-विधि या धार्मिक निर्णय लेने से पूर्व अपने पंडित, गुरु या स्थानीय परंपरा का पालन करें। वेबसाइट किसी भी धार्मिक विवाद या असहमति के लिए उत्तरदायी नहीं है।

 परिचय:-

कार्तिक पूर्णिमा (KARTIK PURNIMA) हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना गया है।
इस दिन देवताओं का दीपावली पर्व (देव दीपावली) भी मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण किया था। साथ ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का संहार किया था, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

कार्तिक मास को स्वयं भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का प्रिय महीना माना गया है। इस पूर्णिमा को स्नान, दान, दीपदान और व्रत का विशेष महत्व प्राप्त है।
इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, दानपुण्य, भक्तिभाव से पूजन करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस दिन देव दीपावली के रूप में गंगा घाटों पर हजारों दीप जलाए जाते हैं। काशी (वाराणसी), हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक आदि पवित्र स्थलों पर विशेष आयोजन किए जाते हैं।

पौराणिक कथा (संक्षेप में):-

पौराणिक कथा के अनुसार, त्रिपुरासुर नामक राक्षस ने अत्याचार बढ़ा दिए थे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया। यह युद्ध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था।
इसलिए भगवान शिव के इस पराक्रम के उपलक्ष्य में देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया, जो आगे चलकर देव दीपावली कहलाया।

एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर पृथ्वी को प्रलय से बचाया था।

पूजन विधि:-

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें, विशेषकर गंगा या किसी पवित्र नदी में

भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा करें।

दीप जलाकर घर, मंदिर और नदी किनारे दीपदान करें।

तुलसी के पौधे के पास दीप जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

गरीबों, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन दान करें।

“ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमः शिवाय” मंत्रों का जाप करें।

देव दीपावली का विशेष महत्व

देव दीपावली का अर्थ है “देवताओं की दीपावली”।
माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में देवता पृथ्वी पर उतरकर गंगा घाटों पर दीप जलाते हैं। काशी में इस दिन घाटों पर हजारों दीपों की रौशनी मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करती है।
यह दिन सौंदर्य, श्रद्धा और प्रकाश का उत्सव है।

कार्तिक पूर्णिमा व्रत का फल

शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन किया गया स्नान, दान और दीपदान अक्षय फल देने वाला होता है।
यह व्रत व्यक्ति के जीवन से नकारात्मकता, पाप और दोषों का नाश करता है तथा समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति प्रदान करता है।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव की आराधना:-

इस दिन भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों की आराधना करने का विधान है।
कहा गया है —
त्रिपुरे हत त्रिपुरे शिवोत्तमे, त्रिदेवपूजा कार्तिके फले शुभे।
अर्थात् कार्तिक पूर्णिमा पर त्रिदेव की पूजा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं।

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