चित्रगुप्त पूजा : महत्व, कथा और विधि

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परिचय

चित्रगुप्त पूजा हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो दीपावली के ठीक बाद मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से लेखाकारों, शिक्षकों, व्यवसायियों और कायस्थ समाज के लोगों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। चित्रगुप्त जी को “कायस्थों के आराध्य देव” कहा जाता है। वे भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं और सभी प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का कार्य करते हैं।

चित्रगुप्त जी का इतिहास और उत्पत्ति

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा सृष्टि रचना में व्यस्त थे, तब उन्होंने देखा कि मनुष्य अच्छे-बुरे कर्म करते हैं, परंतु उन्हें याद नहीं रखते। तब उन्होंने अपने शरीर के चित्र (मन) से एक तेजस्वी पुरुष की रचना की, जिसका नाम रखा गया — चित्रगुप्त
ब्रह्मा जी ने उन्हें यह दायित्व सौंपा कि वे पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव के कर्मों का लेखा रखें और मृत्यु के बाद यमराज को उसकी जानकारी दें। इस प्रकार चित्रगुप्त जी को कर्मों के लेखाजोखा के देवता कहा गया।

चित्रगुप्त पूजा की तिथि और समय

चित्रगुप्त पूजा भाई दूज के अगले दिन या यम द्वितीया के दूसरे दिन मनाई जाती है। इस दिन को कायस्थ द्वितीया भी कहा जाता है।
वर्ष 2025 में चित्रगुप्त पूजा 23 अक्टूबर (गुरुवार) को मनाई जाएगी।

चित्रगुप्त पूजा की विधि

प्रातः स्नान कर घर की सफाई करें और पूजा स्थल को सजाएँ।

चौकी पर चित्रगुप्त जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

कलम, दवात, रजिस्टर, लेखा पुस्तिका तथा गणना सामग्री पूजा में रखें।

गणेश जी और माता सरस्वती की पूजा करने के बाद चित्रगुप्त जी की आराधना करें।

पूजन के दौरान ‘ श्री चित्रगुप्ताय नमः’ का जाप करें।

पूजा के बाद नये रजिस्टर में “श्री गणेशाय नमः” लिखकर वर्ष की नई शुरुआत करें।

परिवार के सभी सदस्य मिलकर प्रसाद ग्रहण करें।

चित्रगुप्त पूजा कथा (संक्षेप में)

प्रथम कथाचित्रगुप्त जी की उत्पत्ति

एक बार यमराज ने ब्रह्मा जी से कहा – “प्रभु! जब मनुष्य मर जाता है तो वह अपने कर्म भूल जाता है, ऐसे में न्याय कैसे हो?” तब ब्रह्मा जी ने अपने शरीर के चित्र भाग से एक तेजस्वी पुरुष की रचना की। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था और हाथ में कलम-दवात थी। ब्रह्मा जी ने कहा – “हे चित्रगुप्त! तुम सभी प्राणियों के जन्म-मरण और कर्मों का लेखा रखोगे।”
इस प्रकार चित्रगुप्त जी न्याय और कर्म के लेखा के देवता बने।

द्वितीय कथाराजा शुभसेन की कथा

एक समय की बात है, राजा शुभसेन नामक एक धर्मप्रिय राजा था। एक दिन उसने अपने जीवन के पापों पर विचार किया और क्षमा के लिए तप करने लगा। तब चित्रगुप्त जी प्रकट हुए और कहा — “हे राजन! जो व्यक्ति कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन मेरी पूजा करेगा, वह अपने पापों से मुक्त होकर पुण्य प्राप्त करेगा।”
राजा शुभसेन ने उस दिन पूजा की और तब से यह परंपरा प्रारंभ हुई।

तृतीय कथाकायस्थ समाज का उद्भव

शास्त्रों में वर्णन है कि जब चित्रगुप्त जी ने सृष्टि के कर्मों का लेखा संभालना प्रारंभ किया, तब उन्होंने अपने कार्य में सहायता हेतु बारह पुत्रों को जन्म दिया। इन बारह पुत्रों से ही कायस्थ समाज की बारह शाखाएँ उत्पन्न हुईं — जैसे श्रीवास्तव, सक्सेना, माथुर, निगम, गौल, भटनागर आदि।
इसलिए कायस्थ समाज चित्रगुप्त जी को अपना आराध्य देव मानकर इस दिन विशेष पूजा करते हैं।

चित्रगुप्त पूजा का धार्मिक महत्व

चित्रगुप्त पूजा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में हर कर्म का फल निश्चित है। हमें अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि चित्रगुप्त जी हमारे प्रत्येक कार्य का लेखा रखते हैं।
यह दिन व्यवसायियों के लिए नया लेखा-वर्ष प्रारंभ करने का अवसर होता है, जबकि विद्यार्थियों के लिए ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि का प्रतीक।

कायस्थ समाज में चित्रगुप्त पूजा का आयोजन

इस दिन कायस्थ परिवार विशेष पूजन करते हैं। घरों में कलम-दवात, लेखा पुस्तिकाओं और चित्रगुप्त जी की मूर्ति की आराधना की जाती है। लोग सामूहिक भजन-कीर्तन, भोग और प्रसाद वितरण का आयोजन करते हैं।

निष्कर्ष

चित्रगुप्त पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि यह कर्म, सत्य और न्याय का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अच्छे कर्म ही जीवन में सच्चे सुख और मोक्ष का मार्ग हैं।

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