बराबर गया की गुफाएँ: इतिहास और महत्व

बिहार के गया जिले में स्थित बराबर की गुफाएँ (BARABAR CAVES) भारत की प्राचीनतम शिलागुफाओं में गिनी जाती हैं। ये गुफाएँ न केवल अपनी वास्तुकला और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं बल्कि भारत की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा भी मानी जाती हैं।

बराबर गुफाओं का इतिहास

गया (बिहार) जिले में स्थित बराबर की गुफाएँ भारत की प्राचीनतम शिलाकटित गुफाओं में मानी जाती हैं। इनका निर्माण ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (लगभग 322 .पू. – 185 .पू.) में मौर्य साम्राज्य के दौरान हुआ।

मौर्य साम्राज्य और गुफाओं का निर्माण

सम्राट अशोक (273 .पू.–232 .पू.) ने इन गुफाओं का निर्माण करवाया। अशोक बौद्ध धर्म को मानते थे, लेकिन उन्होंने आजीवक संप्रदाय (AJIVIKAS SECT) को भी संरक्षण दिया।

बराबर गुफाएँ मूलतः आजीवक संप्रदाय के साधुओं के रहने और ध्यान करने हेतु बनवाई गई थीं।

अशोक के बाद उनके पौत्र दशरथ मौर्य ने भी इन गुफाओं का विस्तार कराया और कुछ गुफाएँ बनवाईं।

आजीवक संप्रदाय और गुफाएँ

आजीवक संप्रदाय प्राचीन भारत का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक संप्रदाय था, जिसकी स्थापना मक्कली गोसाल (MAKKHALI GOSALA) ने की थी।

यह संप्रदाय जैन और बौद्ध धर्म के समानांतर विकसित हुआ और नियतिवाद (FATALISM) में विश्वास करता था।

बराबर गुफाओं के कई शिलालेख यह प्रमाणित करते हैं कि ये गुफाएँ आजीवकों को समर्पित थीं।

स्थापत्य और कला

बराबर गुफाओं को कठोर ग्रेनाइट पत्थर में काटकर बनाया गया है।

इन गुफाओं की दीवारों पर की गई मौर्यकालीन पॉलिश (MAURYAN POLISH) इतनी चिकनी और चमकदार है कि आज भी आईने की तरह चमकती हैं।

यह भारत की प्रथम शिलाकटित गुफाएँ हैं, जिन्होंने आगे चलकर बौद्ध चैत्य और विहार गुफाओं की परंपरा को जन्म दिया।

विशेष रूप से लोमस ऋषि गुफा का प्रवेशद्वार भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्ट मिसाल है। इसमें हाथियों की कतार को दिखाया गया है जो स्तूप की ओर बढ़ते हुए दर्शाए गए हैं।

प्रमुख शिलालेख

सुदामा गुफा और लोमस ऋषि गुफा में सम्राट अशोक और दशरथ मौर्य द्वारा लिखवाए गए शिलालेख आज भी मौजूद हैं।

इन शिलालेखों में उल्लेख है कि गुफाएँ “आजीवक संप्रदाय” के साधुओं को दान स्वरूप दी गई थीं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि मौर्य शासक विभिन्न धर्मों को समान सम्मान देते थे।

बाद का महत्व

मौर्य काल के बाद इन गुफाओं का उपयोग बौद्ध और जैन साधकों ने भी किया।

मध्यकाल में इनका महत्व धीरे-धीरे कम हुआ, लेकिन आज ये भारतीय इतिहास और स्थापत्य कला का अनमोल धरोहर स्थल मानी जाती हैं।

बराबर की प्रमुख गुफाएँ

बराबर पहाड़ी में कुल चार मुख्य गुफाएँ स्थित हैं। इन सभी गुफाओं का निर्माण मौर्यकाल (ईसा पूर्व 3री शताब्दी) में करवाया गया था। हर गुफा का अपना अलग ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है।

करन चौपर गुफा (KARAN CHAUPAR CAVE)

यह गुफा सम्राट अशोक के शासनकाल (लगभग 261 ई.पू.) में बनवाई गई थी।

गुफा के भीतर एक शिलालेख मिला है, जिसमें उल्लेख है कि इसे आजीवक संप्रदाय को दान में दिया गया था।

गुफा एक लंबी सुरंग जैसी प्रतीत होती है, जिसकी दीवारें मौर्यकालीन पॉलिश से चमकदार बनाई गई हैं।

यहाँ साधक ध्यान और प्रवचन करते थे।

सुदामा गुफा (SUDAMA CAVE)

इसका निर्माण भी सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व 261 के आसपास कराया।

यह बराबर की सबसे महत्वपूर्ण गुफाओं में से एक है।

गुफा के प्रवेशद्वार पर अशोक का शिलालेख है, जिसमें यह उल्लेख है कि यह गुफा आजीवकों को समर्पित की गई।

गुफा का आकार अर्धवृत्ताकार (HORSESHOE-SHAPED) है और अंदर एक गोल कक्ष तथा एक आयताकार कक्ष है।

यहाँ की पॉलिश आज भी चमकदार दिखाई देती है।

लोमस ऋषि गुफा (LOMAS RISHI CAVE)

यह बराबर की सबसे प्रसिद्ध और कलात्मक गुफा है।

इसका निर्माण अशोक ने शुरू कराया था लेकिन पूर्ण रूप से उसके पौत्र दशरथ मौर्य ने करवाया।

गुफा का प्रवेशद्वार अत्यंत प्रसिद्ध है, जहाँ चैत्य-खिड़की (CHAITYA ARCH) की नकल बनाई गई है।

प्रवेशद्वार पर हाथियों की कतार बनाई गई है जो स्तूप की ओर बढ़ती हुई दिखाई देती है।

इसे भारतीय रॉक-कट आर्किटेक्चर (ROCK-CUT ARCHITECTURE) की सबसे पहली और अद्वितीय मिसाल माना जाता है।

विश्वजोपरी गुफा (VISVAJHOPRI CAVE)

यह गुफा भी दशरथ मौर्य द्वारा बनवाई गई थी।

अन्य गुफाओं की तरह यह भी ग्रेनाइट शिला में काटकर बनाई गई है।

यहाँ भी पॉलिश और स्थापत्य कला की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

माना जाता है कि इसका उपयोग साधकों के ध्यान और प्रवास स्थल के रूप में होता था।

इन चारों गुफाओं में से लोमस ऋषि गुफा कला और वास्तुकला की दृष्टि से सबसे प्रसिद्ध है, जबकि सुदामा गुफा और करन चौपर गुफा अपने शिलालेखों और धार्मिक महत्व के कारण विशेष स्थान रखती हैं।

बराबर (बाणावर) गुफाओं के पास जो मेला और धार्मिक आयोजन होते हैं, वे मुख्यतः शिव जी को समर्पित बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर से जुड़े हुए हैं। इस मंदिर के समीप सावन और शिवरात्रि के अवसर पर एक खास मेला संपन्न होता है।

जैसा कि स्वतः स्थानीय स्रोत बताते हैं, सावन मास के दौरान इस स्थान पर लगभग एक महीने तक तक “मेला” लगता है, जिसमें शिवभक्तों की बहुत बड़ी भीड़ आती है इसके साथ ही, महाशिवरात्रि के समय भी यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है

आयोजन विवरण (TIMELINE):

मेला / आयोजनसमय सीमा
सावन मास मेलासावन महीने में, लगभग 1 महीना
महाशिवरात्रि मेलामहाशिवरात्रि के दिन/कुछ दिन

निष्कर्ष: अगर आप मेला देखने, धार्मिक माहौल का अनुभव करने, या भारी उत्सव का हिस्सा बनने का मन बना रहे हैं, तो सावन मास (जुलाईअगस्त माह) और महाशिवरात्रि का समय सर्वोत्तम रहेगा।

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